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महिला आरक्षण बिल को परिसीमन से जोड़ने की गैर–संवैधानिक राजनीति नहीं चलेगी!

रुद्रपुर,

आगामी मॉनसून सत्र में महिला आरक्षण बिल को बेशर्त लागू करने व अन्य मांगो को लेकर आज अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन ( ऐपवा) द्वारा एक गोष्ठी का आयोजन किया गया।

गोष्ठी में विचार रखते हुए ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव श्वेता राज ने कहा कि भाजपा सरकार देश में अघोषित आपातकाल को घोषित करने के लिए हर रास्ता अपना रही है। इस देश में फासीवादी तानाशाही को क्रूर रूप में लादने के लिए भाजपा सरकार हर तरह की गैर–संवैधानिक कोशिशों में लगी हुई है। परिसीमन विधेयक इसी कोशिश का हिस्सा है। जो पिछले संसद सत्र में भाजपा के पास बहुमत ना होने के कारण गिर गया। दरअसल भाजपा सरकार 2023 में लाए गए महिला आरक्षण बिल को लागू नहीं करना चाहती है। सरकार आरक्षण बिल को परिसीमन से जोड़ना चाहती है और परिसीमन का आधार जनसंख्या को बनाकर परिसीमन करना चाहती है। इससे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कम होगा और कई राज्यों के साथ भेदभाव होगा। इसलिए हमारी मांग है कि 2023 में लाए गए महिला आरक्षण बिल को तुरंत लागू किया जाए तथा महिला आरक्षण बिल को परिसीमन एवं जनगणना से जोड़कर पेश करने की कोशिश न की जाए. बल्कि, इसे बेशर्त लागू किया जाए। इस मॉनसून सत्र से 33% महिला आरक्षण केंद्र एवं राज्य स्तर पर वर्तमान लोकसभा एवं राज्य सभा सीटों पर लागू किया जाए.

उन्होंने कहा कि परिसीमन का मुद्दा केवल दक्षिण भारत का नहीं बल्कि उत्तराखंड में भी असमानता को जन्म दे रहा है। इससे पहाड़ी इलाकों में सीटों का प्रतिनिधि खतरनाक स्तर तक गिर जाएगा। भाजपा सरकार महिला आरक्षण बिल को परिसीमन से जोड़कर पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहती है। असम और जम्मू कश्मीर के चुनाव इसके हालिया उदाहरण है।

ऐपवा की प्रदेश संयोजक शिवानी पांडे ने कहा कि अंकिता भंडारी हत्याकांड में लंबे संघर्ष के बाद सीबीआई जांच को स्वीकार किया गया। परन्तु अभी 6 माह बीत जाने पर भी सीबीआई जांच बिल्कुल भी आगे नहीं बढ़ सकी है। इसके विपरीत भाजपा के जो वी आई पी नेता कटघरे में थे उन्हें भाजपा में और बड़ा पद देकर उन्हें पुरस्कृत किया गया है। भाजपा के अंदर बलात्कारियों व महिला के यौन उत्पीड़न के आरोपियों को पुरस्कृत करने की लंबी पुरानी परंपरा है। ऐसे में भाजपा सरकार से महिला अपराधों में न्याय और आरक्षण की मांग के प्रति उम्मीद धुंधली नजर आती है।

बार काउंसिल ऑफ उत्तराखंड की सदस्य अमनदीप कौर ने कहा कि बड़े ही दुख का विषय है इस देश की आधी आबादी के लिए बने तमाम कानूनों, आयोगों, कमेटियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व ना के बराबर है। हाल ही में सेनेट्री पैड पर टैक्स लगाने के लिए बनी कमेटी में महिलाओ का प्रतिनिधित्व नहीं है। प्रतिनिधित्व होता तो उस कमेटी को महिलाएं समझा पाती कि सेनेटरी पैड जरूरी सामग्री है वह लग्जरी सामग्री नहीं है जिस पर टैक्स लगाया जाए।
यही हाल महिलाओं की शादी की उम्र पुनर्निर्धारण करने वाली कमेटी का भी था। इसलिए हर जगह महिलाओं को आरक्षण की अत्यंत आवश्यकता है।

आम आदमी पार्टी की नेता किरन पांडे ने कहा भाजपा सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा दिया था लेकिन भाजपा शासित राज्यों में महिला उत्पीड़न के मामलों में लगातार वृद्धि दिख रही है। कई मामलों में तो भाजपा के नेता ही आरोपी पाये जा रहे हैं।

उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन की प्रदेश उपाध्यक्ष रीता कश्यप ने सरकारी विभागों में काम करने वाली महिला स्कीम वर्कर्स और फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाओं के आर्थिक शोषण पर बात रखते हुए कहा कि सरकार अपने ही विभागों में काम करने वाली आशा, आंगनबाड़ी, भोजनमाता की मेहनत का शोषण कर रही है। विभाग के हर काम इन महिलाओं के ऊपर लाद दिये जाते हैं परन्तु उन्हें प्रदेश में लागू न्यूनतम वेतन तक नहीं दिया जाता है। आशा कार्यकर्तियों की हालत तो यह है कि वे दिन रात गर्भवती महिलाओं की देखभाल करते हुए अपनी सुरक्षा को खतरे में डालती हैं। दिन रात काम करके उन्होंने मातृ-शिशु दर में अभूतपूर्व कमी करने का साहसिक काम किया है। इसके बावजूद न तो उनकी मेहनत का कोई सम्मान है ना ही उन्हें कोई सम्मानजनक वेतन दिया जाता है। फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाओं को पुरुषों से भी कम वेतन दिया जाता है। इस सब के बावजूद सरकार अपने आपको किस मुंह से महिला हितैषी बताती है।

गोष्ठी में प्रस्ताव लिया गया कि 20 जुलाई को सभी जगह से महिला आरक्षण बिल 2023 को लागू करने की मांग को लेकर ज्ञापन दिया जाए।

गोष्ठी में प्रीति मौर्य, नमिता सरकार, माधवी देवी, पवनदीप कौर, अनिता अन्ना, पुष्पा देवी, ज्योति चंद, श्रीशा, पायल मौर्य, ऐक्टू प्रदेश महामंत्री के के बोरादिनेश तिवारी, रंजन विश्वास , ललित मटियाली, ज्ञानी सुरेन सिंह, धीरज कुमार, मनीष कुमार सहित कई लोग मौजूद थे।

अमनदीप कौर
9997919105

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