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मूलाधार को अब जगाऊँ,
दीर्घ सूँड-सी श्वास बनाऊँ।
सुषुम्ना का करूँ श्रीगणेश,
आज्ञाचक्र में ऊर्जा हो प्रवेश।
प्राणवायु से दीर्घायु प्राण,
आओ गणपति मेरे धाम।
वृहद उदर सब बात पचाए,
उदार हृदय सबको अपनाए।
छोटी आँखें सूक्ष्म दिखाएँ,
आत्मरूप सबमें इक पाएँ।
प्रारंभ कर दो रुके काम,
आओ गणपति मेरे धाम।
मन-मूषक चंचल फिरता,
चेतना से दो एकाग्रता।
एकदंत जग का दिखता टूटा,
सर्व पूर्ण है कुछ भी नहीं छूटा।
सबको सद्गति दो भगवान,
आओ गणपति मेरे धाम।
सत श्रवण से बरसे ज्ञान,
मुझको भी दो सूफ-से कान।
हाथी-सा मदमस्त बन जाऊँ,
सुख, अभय, मुक्ति को पाऊँ।
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी महान,
आओ गणपति मेरे धाम।
अंकुश से मन को राह दिखाएँ,
पाश से मोह-बंधन कटवाएँ।
मोदक ज्ञान-सुधा का धाम,
करुणा बरसे आठों आयाम।
हे विघ्नहर्ता! तुम्हें प्रणाम,
आओ गणपति मेरे धाम।
नरेंद्र रावत ‘नरेन’
संस्थापक एवं मार्गदर्शक
साहित्यिक सचेतना एवं स्वास्तिक पत्रिका
