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ओवर लोड व ओवर स्पीड डंपरों का क्षेत्रवासी पूर्व में भी कर चुके है कार्यवाही की मांग

गदरपुर । लगभग एक सप्ताह पूर्व तेज रफ्तार ओवरलोड डंपर की चपेट में आने से युवक की मौत के मामले में पुलिस द्वारा कोई संतोषजनक कार्रवाई न किए जाने पर दर्जनों ग्रामीणों ने थानाध्यक्ष का घेराव करते हुए कार्रवाई की मांग की, वहीं थानाध्यक्ष जसवीर सिंह चौहान ने आरोपी डंपर चालक के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किए जाने की बात कहते हुए अतिशीघ्र कार्रवाई किए जाने का आश्वासन दिया । उल्लेखनीय हो कि मसीत सकैनिया मार्ग पर बरेली नगर सोलर प्लांट के निकट मसीत की ओर से आ रहे रेत से भरे ओवर लोड डंपर संख्या यू के 06 सी बी 2632 ने एक स्कूटी सवार युवक को अपनी चपेट में ले लिया जिससे युवक गंभीर रूप से घायल हो ग़या और डंपर गड्ढे में जाकर पलट गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार शुक्रवार को मसीत सकैनिया लिंक मार्ग पर बरेली नगर न 02 सोलर प्लांट के निकट मसीत की ओर से आ रहे रेत से भरे एक ओवर लोड डंपर से एक स्कूटी सवार युवक टकराकर गंभीर रूप से घायल हो गया घायल युवक कमल जीत सिंह पुत्र बलविंदर सिंह (22 वर्ष)ग्राम बलखेड़ा नहर मोतियापुर का रहने वाला था और सकैनिया में लोहे की चौखट विंडो बनाने का कार्य किया करता था।शुक्रवार की शाम को सकैनिया काम से स्कूटी से अपने घर बलखेड़ा नहर, मोतियापुर लौट रहा था तभी बरेली नगर स्थित सोलर प्लांट के निकट मसीत की ओर से आ रहे रेत से भरे डंपर से टकरा गया जिसके चलते डंपर रोड किनारे गड्ढे में पलट गया वही डंपर से टकराकर कमल जीत सिंह गंभीर रूप से घायल हो गया जिसको मौके पर पहुची पुलिस व ग्रामीणों ने 108 के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गदरपुर पहुचाया जहा चिकित्सको ने उसे मृत घोषित कर दिया था।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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