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आजकल सोशल मीडिया पर एक नया “पेशा” तेजी से बढ़ रहा है —
500 रुपये का माइक, 2000 रुपये का फोन और खुद को कंटेंट क्रिएटर घोषित कर दो।

ना तथ्य की जांच, ना जिम्मेदारी का एहसास… बस किसी भी मामले को पकड़ो और उसे सनसनी बनाकर परोस दो।
परिणाम यह होता है कि समाज में भ्रम फैलता है, लोग गुमराह होते हैं और कई बार पुलिस-प्रशासन को भी बेवजह के मामलों में उलझना पड़ता है।दुखद बात यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार या समाज की असली समस्याओं पर बनी गंभीर बातों को देखने वाला कोई नहीं मिलता।लेकिन किसी की निजी जिंदगी में झांकने वाला, हंगामा खड़ा करने वाला या बेवजह विवाद पैदा करने वाला कंटेंट मिनटों में वायरल हो जाता है।सच कहें तो इसमें गलती सिर्फ ऐसे तथाकथित कंटेंट क्रिएटर्स की ही नहीं है।हम दर्शक भी उतने ही जिम्मेदार हैं, क्योंकि जिस चीज़ को हम देखते, लाइक करते और शेयर करते हैं, वही चीज़ बढ़ती है।अगर हम सच में समाज को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले गैर-जिम्मेदार और भ्रामक कंटेंट को देखना और प्रमोट करना बंद करना होगा।सोशल मीडिया एक ताकत है —
अब यह हम पर निर्भर है कि हम इसे जागरूकता के लिए इस्तेमाल करेंगे या सिर्फ शोर और तमाशे के लिए।

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