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गदरपुर । विभिन्न संगठनों द्वारा उत्तराखंड में सौहार्दपूर्ण वातावरण में फैलाए जा रहे मानसिक द्वेष भावनाओं के कार्यों पर जागृति अभियान चलाते हुए समाजसेवी शानू और शानू चोपड़ा द्वारा अपने बेटे मोहम्मद सुफियान और बेटी महामायजा के साथ तिरंगा लेकर नगर में शांति मार्च किया गया। उनका कहना था,
उत्तराखंड में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं,वैसे-वैसे राजनीति का स्वर बदलता जा रहा है। विकास,रोज़गार,शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन जैसे बुनियादी मुद्दों से हटकर सियासत अब नफरत और ध्रुवीकरण की राह पर बढ़ती दिख रही है। राजनीतिक बयानबाज़ी,सोशल मीडिया अभियानों और सार्वजनिक मंचों पर दिए जा रहे भाषणों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल बढ़ा है, जो समाज को जोड़ने के बजाय बाँटने का काम कर रही है।
राज्य की राजनीति में इन दिनों धर्म,जाति और पहचान के नाम पर माहौल गरमाया हुआ है। आरोप-प्रत्यारोप का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि अब वैचारिक असहमति की जगह एक-दूसरे को देशद्रोही, असंस्कारी या धर्मविरोधी ठहराने की कोशिशें की जा रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह रणनीति मतदाताओं को वास्तविक मुद्दों से भटकाने के लिए अपनाई जा रही है ।अपुष्ट वीडियो,
आधे-अधूरे तथ्य और भ्रामक संदेशों के ज़रिये लोगों की भावनाओं को उकसाया जा रहा है। खास तौर पर युवाओं को निशाना बनाकर ऐसे कंटेंट फैलाए जा रहे हैं, जो समाज में अविश्वास और डर का माहौल पैदा करते हैं। उनका कहना है कि अगर समय रहते इस पर लगाम नहीं लगी,तो इसके सामाजिक परिणाम लंबे समय तक झेलने पड़ सकते हैं।
देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की पहचान लोगों की भावनाओं को उकसाया जा रहा है। खास तौर पर युवाओं को निशाना बनाकर ऐसे कंटेंट फैलाए जा रहे हैं,जो समाज में अविश्वास और डर का माहौल पैदा करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इस पर लगाम नहीं लगी,तो इसके सामाजिक परिणाम लंबे समय तक झेलने पड़ सकते हैं।देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की पहचान हमेशा से ये सहिष्णुता,आपसी सौहार्द और सांस्कृतिक संतुलन की रही है। लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह पहचान खतरे में दिख रही है। आम जनता के बीच भी इस माहौल को लेकर बेचैनी बढ़ रही है। जागरूक लोगों ने शानू चोपड़ा के उक्त प्रदर्शन को सराहा ।

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