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गदरपुर । नगर के प्रतिष्ठित रेड रोज कान्वेंट स्कूल में श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350 वें शहीदी शताब्दी को समर्पित गोष्ठी का भारत विकास परिषद द्वारा आयोजन किया गया । कार्यक्रम का शुभारंभ रेड रोज कान्वेंट स्कूल के डायरेक्टर नैब सिंह धालीवाल के निर्देश पर बच्चों द्वारा गुरबाणी कीर्तन करके किया गया । गोष्ठी में सिख मिशनरी कॉलेज लुधियाना की गदरपुर इकाई के इंचार्ज देवेंद्र सिंघ द्वारा श्री गुरु तेग बहादुर जी के जीवन एवं शहीदी पर प्रकाश डाला गया । उन्होंने कहा, गुरु तेग बहादुर जी ने मानवता की खातिर अपना बलिदान देकर देश धर्म और सनातन धर्म की रक्षा के लिए सभी को एकजुट होने का आहवान किया उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी की शिक्षा के अनुसार, किसी को डर देना भी नहीं है किसी से डरना भी नहीं है । नेक कार्य करने के लिए स्वयं को समर्पित कर देना चाहिए । उन्होंने भाई मतिदास, भाई सती दास, भाई दयाला जी की शहीदी पर भी जानकारियां प्रदान की । वहीं कार्यक्रम के समापन पर स. नैब सिंह धालीवाल ने सभी वक्ताओं का धन्यवाद करने के साथ बच्चों को गुरु तेग बहादुर जी के आदर्शों पर चलने एवं देश धर्म की खातिर शहीद होने वाले अन्य शहीदों की जीवन गाथा का भी ज्ञान प्राप्त करने का आहवान किया । इस दौरान भारत विकास परिषद के अध्यक्ष राजीव ग्रोवर सचिव डॉ सोनू विश्वास, कोषाध्यक्ष डॉ. विनीत अरोड़ा, एवं महिला सहभागिता श्रीमती अंजू भुड्डी जी द्वारा रेड रोड कन्वेंट स्कूल के डायरेक्टर नैब सिंह धालीवाल और देवेंद्र सिंघ को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया । इस दौरान स्कूल के सभी स्टाफ एवं बच्चों ने ‘बोले सो निहाल,सत श्री अकाल’ के जैकारे बोलकर गुरु तेग बहादुर जी एवं अन्य शहीदों को नमन किया।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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