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पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। जिलाधिकारी डॉ.आशीष चौहान ने कलेक्ट्रेट सभागार में राजस्व की मासिक स्टाफ समीक्षा बैठक ली। उन्होंने बैठक में क्रमवार राजस्व,रेगुलर पुलिस,पूर्ति विभाग,आबकारी विभाग,राजस्व वसूली,लंबित वाद सहित अन्य की अभी तक की गई कार्यवाही पर समीक्षा करते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिये। गुरुवार को बैठक में उपजिलाधिकारी रिखणीखाल के अनुपस्थित रहने पर जिलाधिकारी ने स्पष्टीकरण तलब किया। वहीं उन्होंने ई-ऑफिस में धीमी प्रगति पर तहसील बीरोंखाल,चौबट्टाखाल,धुमाकोट,जाखणीखाल,कोटद्वार,सतपुली,यमकेश्वर के तहसीलों को प्रगति लाने के निर्देश दिये। उन्होंने लंबित राजस्वों वादों को समय पर निस्तारण करने के निर्देश समस्त उपजिलाधिकारी व तहसीलदारों को दिये। साथ ही उन्होंने संबंधित अधिकारियों को कहा कि वसूली के कार्यों की प्रगति बढ़ाने व बड़े बकायादारों पर वसूली की कार्यवाही तेजी से करें। सभी तहसीलों में कुल 772 वाद हैं,जिसमें माह के अंतिम तक 165 वादों का निस्तारण किया गया जबकि 607 वाद अवशेष हैं। उन्होंने सभी उपजिलाधिकारियों को निर्देश दिये कि वादों का सही विवरण आरसीएमएस पोर्टल पर अपलोड करना सुनिश्चित करें। वहीं पूर्ति विभाग द्वारा दुकानों में घरेलू गैस सिलेंडर का उपयोग करने पर 100 लोगों पर चालानी कार्यवाही की गई,जिसमें 02 लाख 27 हजार का चालान किया गया जबकि 01 गैस सिलेंडर को जब्त किया गया। जिलाधिकारी ने पूर्ति अधिकारी को जनपद के अंतर्गत पेट्रोल की गुणवत्ता चेक करने के लिए पेट्रोल पंपों का निरीक्षण करने के निर्देश दिये हैं। जिलाधिकारी ने संबंधित अधिकारी को शत प्रतिशत किसानों का लैंड सीडिंग करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने समस्त उपजिलाधिकारी व आरटीओ विभाग के अधिकारियों को बिना हेलमेट और शराब पीकर वाहनों का संचालन करने वाले चालकों के विरुद्ध कार्यवाही करना सुनिश्चित करें। साथ ही उन्होंने उपजिलाधिकारी धुमाकोट व एआरटीओ को नैनीडांडा-धुमाकोट क्षेत्र में संकरें मार्गों का निरीक्षण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिये हैं। जिलाधिकारी ने खनन अधिकारी को खनन क्षेत्रों में संबंधित क्षेत्र के उपजिलाधिकारी के साथ संयुक्त निरीक्षण करते हुए अवैध खनन पर रोक लगाने के निर्देश दिये हैं। इसके अलावा उन्होंने उप निबंधक अधिकारी पौड़ी को कहा कि निबंधक कार्यालय पौड़ी में शौचालय बनवाना सुनिश्चित करें। उन्होंने अधिकारियों को निर्धारित लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के निर्देश दिए। साथ ही उन्होंने बेहतर कार्यप्रणाली अपनाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने पर भी दिशा-निर्देश दिए। बैठक में अपर जिलाधिकारी अनिल गर्ब्याल,एएसपी अनूप काला,संयुक्त मलिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र शेट,उपजिलाधिकारी श्रीनगर नूपुर वर्मा,कोटद्वार सोहन सैनी,लैंसडौन शालिनी मौर्य,चौबट्टाखाल अनिल चन्याल,धुमाकोट रेखा यादव,जिला आबकारी अधिकारी केपी सिंह,खनन अधिकारी राहुल नेगी,तहसीलदार पौड़ी दीवान सिंह राणा,श्रीनगर धीरज राणा,मुख्य प्रशासनिक अधिकारी अजित रावत,पेशकार निशा असवाल सहित अन्य अधिकारी व पटल सहायक उपस्थित थे।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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