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जेसीज पब्लिक स्कूल की नव निर्मित जूनियर बिल्डिंग में माँ सरस्वती के प्राकट्य दिवस बसंत पंचमी के पावन पर्व के अवसर पर माँ सरस्वती की विधिवत पूजा-अर्चना कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मंत्रोच्चार के साथ ज्ञान की देवी का आह्वान किया गया।

शिक्षक-शिक्षिकाओं के द्वारा भजन-कीर्तन प्रस्तुत कर विद्यालय के वातावरण को भक्तिमय बना दिया। विद्यालय प्रबंधन समिति के महासचिव श्री सुरजीत सिंह ग्रोवर ने शिक्षकों को बसंत पंचमी की बधाई देते हुए कहा कि जेसीज पब्लिक स्कूल विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा एवं संस्कार देने के लिए निरंतर संकल्पित है। उन्होंने कहा कि विद्यालय का यह नया भवन इस क्षेत्र के नौनिहालों को आधुनिक समय के अनुरूप विश्वस्तरीय शिक्षण एवं शिक्षणेत्तर सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के लिए बेहतर प्रयास है। उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट शैक्षिक संस्थान देने का उन्होंने जो एक सपना देखा था वह पूरा हो रहा है। विद्यालय के निदेशक सुधांशु पन्त ने कहा कि इस विद्यालय के अभिभावकों तथा विद्यार्थियों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सभी की प्रतिबद्धता नितान्त आवश्यक है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों के शैक्षिक विकास के साथ-साथ उनमें अपनी संस्कृति एवं संस्कारों के प्रति सद्भावना एवं आदर भाव का समावेश करना है। इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य आर.डी. शर्मा ने समस्त शिक्षकों को बसंत पंचमी की बधाई दी तथा उन्हें निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करने का संदेश देते हुए भविष्य में सर्वोत्तम परीक्षा परिणाम की कामना की। इस अवसर पर समस्त अध्यापकों एवं कर्मचारियों ने विद्यालय की उत्तरोत्तर उन्नति के लिए माँ सरस्वती से प्रार्थना की।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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