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रूद्रपुर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, और सीपीपी की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी जी के जन्म दिवस के अवसर पर किच्छा रोड स्थित कुष्ठ रोगी आश्रम में पहुंचकर दर्जनों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनकी दीर्घायु को लेकर कुष्ठ रोगियों को फल वितरित किए l इससे पूर्व जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हिमांशु गाबा,रुद्रपुर नगर पालिका परिषद की पूर्व चेयरपर्सन श्रीमती मीना शर्मा, महानगर कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष ममता रानी, और पूर्व महानगर अध्यक्ष सीपी शर्मा,के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता कुष्ठ रोगी आश्रम में एकत्र हुए, जहां उन्होंने सोनिया गांधी जिंदाबाद के नारे लगाते हुए कुष्ठ रोगियों को फल वितरित कर उनके दीर्घायु की कामना की l इस अवसर पर कांग्रेस सेवादल के अध्यक्ष संजीव रस्तोगी, निगम पार्षद चिराग कालड़ा,निगम पार्षद बाबू खान, पूर्व निगम पार्षद अबरार अहमद,उमा सरकार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अनिल शर्मा, उपाध्यक्ष सतीश कुमार,बाबू विश्वकर्मा, वजीर अहमद, सुभाष दिवाकर, श्रीमती सरोज रानी, भूरी देवी, निगम पार्षद का चुनाव लड़ी पूनम दिवाकर, रामबाबू, रविंद्र गुप्ता, देबू कोली, अरविंद सक्सेना, पूर्व नगर उपाध्यक्ष सतीश कुमार, ज्योति टम्टा,आजम खान, दिनेश मौर्य, सेवाराम दिवाकर, नरेश सागर,सहित बड़ी संख्या में अन्य कांग्रेस कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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