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गदरपुर। किसानों की विभिन्न गंभीर समस्याओं को लेकर माननीय मुख्यमंत्री,उत्तराखण्ड सरकार को संबोधित एक ज्ञापन उपजिलाधिकारी परगना गदरपुर एवं तहसीलदार गदरपुर, जनपद उधम सिंह नगर के माध्यम से सौंपा गया। ज्ञापन में किसानों से जुड़े भूमि,शिक्षा एवं सुरक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण मांगें रखी गईं।
ज्ञापन में बताया गया कि वर्ग-5 की भूमि,जिसे 1990 के दशक में अधिकारियों द्वारा किसानों की जानकारी के बिना वर्ग-4 एवं भूमिधरी भूमि को वर्ग-5 में दर्ज कर दिया गया, उस पर किसान पिछले लगभग 40 वर्षों से काबिज हैं। ऐसे भूमिधरी किसानों के अधिकार सुरक्षित किए जाने की मांग की गई।
इसके साथ ही मांग की गई कि वर्ग-4 एवं वर्ग-1 (ख) की भूमि को 9 नवम्बर 2000 के सर्किल रेट पर नजरी जमा कराकर उसका नवीनीकरण किया जाए।
ज्ञापन में यह भी कहा गया कि अनुसूचित जाति समाज के किसानों को अन्य किसानों को भूमि बेचने की अनुमति दी जाए। वहीं आरोप लगाया गया कि वर्ग-5 की भूमि पर प्रशासन द्वारा किसानों को डराकर जबरन कब्जा किया जा रहा है, जबकि किसान 40 से 60 वर्षों से उस भूमि पर जोत-खेत कर रहे हैं और मकान बनाकर निवास कर रहे हैं। ऐसे किसानों को नोटिस देकर भूमि खाली कराने की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की गई।
किसानों ने बताया कि हरिपुरा डाम निर्माण के लिए सरकार द्वारा लगभग 60 वर्ष पूर्व किसानों की भूमिधरी जमीन ली गई थी,जिसके बदले उन्हें ग्राम डलपुरा, तहसील गदरपुर में विस्थापित किया गया था। लेकिन अब तक उन किसानों को वहां की भूमि पर भूमिधरी अधिकार नहीं दिए गए,जिससे वे किसी प्रकार का ऋण नहीं ले पा रहे हैं। प्रशासन से शीघ्र भूमिधरी अधिकार प्रदान करने की मांग की गई।
इसके अलावा ज्ञापन में उत्तराखण्ड में पांच एकड़ तक भूमि रखने वाले किसानों के बच्चों को आरटीई के तहत मुफ्त शिक्षा देने की मांग की गई।
अंत में किसानों ने लावारिस पशुओं की समस्या उठाते हुए कहा कि इनके कारण आम जनता की जान-माल को नुकसान हो रहा है और किसानों की खड़ी फसलों को भारी क्षति पहुंच रही है। प्रशासन से इस पर प्रभावी रोक लगाने की मांग की गई।
किसानों ने आशा जताई कि सरकार उनकी समस्याओं पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेगी।प्रदेश अध्यक्ष कर्म सिंह पड्डा, युवा प्रदेश अध्यक्ष जितेंद्र सिंह जीतू,जिलाध्यक्ष गुरसेवक सिंह, ब्लॉक अध्यक्ष हरपाल सिंह दर्शन सिंह देओल,शीतल सिंह जगजीत सिंह भुल्लर,अमनप्रीत सिंह,गुरमुख सिंह गोराया,
बलविंदर सिंह,जरनैल सिंह, पलविंदर सिंह,प्रिंस ढिल्लो , लखविंदर सिंह,चंचल सिंह, सुखदेव लाल,हैप्पी विर्क सहित हजारों की संख्या में किसान मौजूद रहे।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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