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सितारगंज:(अश्वनी दीक्षित)नगर में भाजपा युवा मोर्चा के नवनियुक्त प्रदेश महामंत्री दीपेंद्र कोश्यारी के स्वागत समारोह ने राजनीतिक माहौल में नई ऊर्जा भर दी। मुख्य चौराहे पर भारी संख्या में एकत्र युवा कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं ने फूल-मालाओं, नारों और आतिशबाज़ी के बीच उनका भव्य स्वागत किया। स्वागत रथ के साथ युवाओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। इसके बाद नई मंडी सभागार में आयोजित विशेष स्वागत समारोह में दीपेंद्र कोश्यारी ने कहा कि युवा राष्ट्र की असली शक्ति हैं, और जब युवा आगे बढ़ते हैं तो विकास अपने आप नई दिशा पकड़ लेता है। उन्होंने उत्तराखंड की धामी सरकार के ऐतिहासिक फैसलों और जनकल्याणकारी योजनाओं को घर-घर पहुंचाने में युवा मोर्चा की प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए कहा कि आने वाले विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड की युवा शक्ति भाजपा को पुनः प्रचंड बहुमत दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाएगी। कोश्यारी ने कहा कि युवाओं के सपनों व आकांक्षाओं को पूरा करना भाजपा का संकल्प है और सितारगंज की जनता के प्रेम-सम्मान ने उनकी जिम्मेदारी और बढ़ा दी है। समारोह में उमड़ी भारी भीड़ ने साफ संदेश दिया कि युवा मोर्चा आगामी राजनीतिक चुनौतियों का सामना पूरी मजबूती के साथ करेगा। कार्यक्रम में भाजपा जिला अध्यक्ष कमल जिंदल, मंडल अध्यक्ष मुकेश सनवाल, युवा मोर्चा अध्यक्ष शशांक बिष्ट, महामंत्री बिट्टू चौहान, मयंक अग्रवाल, नवीन भट्ट सहित वरिष्ठ-कनिष्ठ पदाधिकारी और बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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