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गदरपुर । राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत विकासखंड गदरपुर के पियर एजुकेटर के 6 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का दिनांक 3 जनवरी 2024 को डॉ संजीव सरना प्रभारी चिकित्सा अधिकारी द्वारा राजकीय बालिका इंटर कॉलेज गदरपुर में शुभारंभ किया गया। डॉ संजीव सरना द्वारा बताया गया कि किशोरावस्था जीवन का अहम पड़ाव है इस आयु वर्ग के किशोर किशोरियों को अपने स्वास्थ्य के प्रति सदैव जागरूक रहना चाहिए। किशोरावस्था आयु के बच्चों का मन कच्चे घड़े की तरह होता है उसको जिस रूप में ढाल दो उसी में ढल जाते हैं अतः बच्चों को अपने शारीरिक एवं मानसिक रूप से होने वाले परिवर्तनों के विषय में व्यापक रूप से सही एवं वैज्ञानिक जानकारियां होनी चाहिए तथा किसी भी प्रकार की भ्रांतियां में ना पढ़कर के अपने बड़ों से एवं निकट चिकित्सा इकाइयों/एडोलिसेंट हेल्थ क्लिनिक में आकर के अपनी शंका का निवारण करना चाहिए! कार्यक्रम के द्वितीय दिवस पर डॉ विकास सचान (चिकित्सा अधिकारी, राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) द्वारा पियर एजुकेटर को स्वच्छता एवं पोषण के महत्व के बारे में जानकारियां दी गई तथा एनीमिया अर्थात खून की कमी के कारणों,लक्षणों एवं उससे बचने के उपायों के बारे में विस्तार से बताया गया ! डॉ प्रशांत चौहान द्वारा किशोर किशोरियों में नशे के दुष्प्रभावों को लेकर चर्चा की गई उन्होंने कहा,नशा समाज के लिए एक अभिशाप है,इसकी वजह से घर परिवार एवं समाज की प्रगति रुक जाती है नशे की रोकथाम हेतु स्वास्थ्य विभाग द्वारा चलाए जा रहे हैं कार्यक्रमों के बारे में जानकारी दी गई।कार्यक्रम में डॉक्टर रेखा द्वारा मासिक धर्म स्वच्छता पर किशोरियों को विशेष जानकारियां प्रदान की गई ! कार्यक्रम प्रभारी श्रीमती राधा मिगलानी आरकेएस के काउंसलर द्वारा राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के महत्व एवं किशोर- किशोरियों की पियर एजुकेटर के रूप में उनकी भूमिका के बारे में बताया गया। श्रीमती राधा मिगलानी द्वारा बताया गया कि उपरोक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन दिनांक 7 जनवरी 2024 को होगा एवं इसमें किशोर किशोरियों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित 11 मॉडलों पर चर्चा की जाएगी। कार्यक्रम में समर्थ संस्था के श्री दीपांशु एवं प्रियंका द्वारा मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित गतिविधियों पर पोस्टर चर्चा एवं सामूहिक चर्चा की जाएगी। कार्यक्रम में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की श्रीमती विमला वैद्य स्टाफ नर्स,श्रीमती सोनिया स्टाफ नर्स,श्री आतिश कालरा एवं आशा बहनों द्वारा चर्चा में प्रतिभाग किया गया।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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