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गदरपुर। उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, नैनीताल के तत्वावधान में तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, उधम सिंह नगर के माननीय सचिव योगेन्द्र कुमार सागर के निर्देशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस राजकीय आवासीय बालिका छात्रावास,गदरपुर में राष्ट्रीय बालिका दिवस के उपलक्ष्य में जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बताया गया कि राष्ट्रीय बालिका दिवस (24 जनवरी) भारत में बालिकाओं के अधिकारों, शिक्षा,स्वास्थ्य एवं सशक्तिकरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से मनाया जाता है,ताकि समाज में व्याप्त लैंगिक भेदभाव और असमानता को समाप्त कर बालिकाओं को समान अवसर प्रदान किए जा सकें। यह दिवस बालिकाओं के सामने आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए उनके समग्र विकास को बढ़ावा देता है। इसकी शुरुआत वर्ष 2008 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा की गई थी।
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) बालिकाओं के लिए एक रक्षक की भूमिका निभाता है,जो उन्हें निर्भय होकर जीवन जीने एवं न्याय प्राप्त करने में सहायता करता है। साथ ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रदान की जाने वाली निःशुल्क विधिक सेवाओं की जानकारी दी गई।
छात्राओं को स्थायी लोक अदालत,साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 तथा नालसा टोल फ्री नंबर 15100 के संबंध में भी जानकारी देकर जागरूक किया गया।
इस कार्यक्रम में पैनल अधिवक्ता गुरजीत सिंह एवं प्राविधिक कार्यकर्ता राजकुमारी,संगीता सरदार तथा गोपाल सिंह गौतम द्वारा छात्राओं को उनके अधिकारों के विषय में विस्तार से जानकारी दी गई।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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