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रुद्रपुर। 10 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार रक्षक शाखा रुद्रपुर की ओर से गल्ला मंडी स्थित कार्यालय में एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक, पदाधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने मानवाधिकारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, स्वतंत्रता और न्याय प्राप्त करना उसका मूल अधिकार है। लोगों को मानवाधिकार से जुड़े प्रावधानों और आयोग की भूमिका के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई। साथ ही उनसे अपील की गई कि यदि उनके आसपास किसी भी तरह का मानवाधिकार उल्लंघन होता है, तो वह बेझिझक इसकी जानकारी अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार रक्षक संगठन के पदाधिकारियों को दें, ताकि पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में प्रभावी कार्रवाई की जा सके।

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार रक्षक के प्रदेश अध्यक्ष राजेश चावला ने बताया कि संगठन द्वारा पूरे भारतवर्ष में मानव कल्याण से जुड़े अनेक कार्य किए जा रहे हैं, जिनमें वृक्षारोपण अभियान, वृद्धाश्रम व बाल आश्रमों में सहयोग, सामाजिक उत्थान से जुड़े कार्यक्रम तथा मानवाधिकार संरक्षण विषयक जनजागरूकता प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में भी संगठन इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है और समाज में भयमुक्त वातावरण बनाने की दिशा में लगातार प्रयासरत है।

राजेश चावला ने यह भी बताया कि कार्यक्रम में आमंत्रित सभी लोगों का सम्मान किया गया तथा उन्हें संगठन से जुड़कर समाज की सेवा करने के लिए प्रेरित किया गया। उन्होंने उपस्थित लोगों से आग्रह किया कि अधिक से अधिक संख्या में मानवाधिकार रक्षक अभियान का हिस्सा बनें और एक न्यायपूर्ण एवं सुरक्षित समाज के निर्माण में योगदान दें।

कार्यक्रम का समापन मानवाधिकारों की रक्षा एवं जनजागरूकता को बढ़ाने के संकल्प के साथ किया गया।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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