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सितारगंज:(अश्वनी दीक्षित) सरस्वती शिशु मंदिर सितारगंज में बीते शुक्रवार को बसंत पंचमी का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक गरिमा के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय अध्यक्ष नरेश कंसल एवं प्रधानाचार्य देव सिंह विष्ट द्वारा मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इस अवसर पर आचार्य बंधुओं व बहनों ने पीत वस्त्र धारण कर सामूहिक रूप से सुंदरकांड का पाठ किया, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया। बसंत पंचमी के शुभ मुहूर्त में 25 नन्हे-मुन्ने बच्चों का विधिवत प्रवेश संस्कार संपन्न कराया गया, जहां वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा-अर्चना, तिलक, चंदन व मिष्ठान वितरण कर बच्चों को शिक्षा, संस्कार और राष्ट्रसेवा के पथ पर अग्रसर होने का आशीर्वाद दिया गया। इसके उपरांत हवन-पूजन कर समस्त देवी-देवताओं का स्मरण किया गया तथा सभी विद्यार्थियों को प्रसाद वितरित किया गया। आचार्यगणों ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि निश्चल, निष्काम एवं स्वार्थरहित प्रेम से ही व्यक्ति के चरित्र, शक्ति और संस्कारों का विकास होता है। कार्यक्रम में महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस गरिमामय आयोजन में विद्यालय अध्यक्ष नरेश कंसल, प्रबंधक शिवपाल सिंह चौहान, सह-प्रबंधक पवन बडसीवाल, उपाध्यक्ष पंकज गहतोड़ी, प्रधानाचार्य देव सिंह विष्ट, आचार्या रेखा गंगवार, कीर्ति बल्लभ भट्ट, अभिभावकगण, समस्त आचार्यवृंद एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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