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गदरपुर । सिख धर्म के महान जरनैल और मिसल शहीदां के प्रमुख संस्थापक शहीद बाबा दीप सिंह के पावन जन्मदिन के उपलक्ष में गुरुद्वारा माता गुजरी जी आदर्श कॉलोनी रुद्रपुर से अरदास करने के उपरांत पैदल मार्च करते हुए एक विशाल प्रभात फेरी/शोभा यात्रा का आयोजन किया गया।शोभा यात्रा रुद्रपुर से चलकर ग्रीन पार्क, दानपुर, जाफरपुर, धौलपुर, महेशपुर,गु.गुरु नानक दरबार महतोष,रतनपुरी, अलखदेवा ,रतनपुरा होते हुए गुरुद्वारा श्री गुरु हरगोबिंदसर नवाबगंज जिला रामपुर उत्तर प्रदेश में पहुंची जहां गुरुद्वारा साहिब के मुख्य सेवादार बाबा अनूप सिंह के निर्देश पर सेवादार भाई गुरमीत सिंह ने सभी मुख्य सेवादारों एवं प्रभात फेरी आयोजकों को सिरोपा भेंट कर बाबा दीप सिंह जी के जन्मदिन की शुभकामनाएं प्रदान की। बाबा दीप सिंह सेवा ट्रस्ट के आयोजकों ने बताया कि संगत के सहयोग से जागरूकता अभियान चलाते हुए गुरुद्वारा माता गुजरी जी आदर्श कॉलोनी रुद्रपुर से पैदल यात्रा की यह चौथी पैदल यात्रा है जो कि रुद्रपुर से महतोष हुए गु. श्री गुरु हरगोबिंदसर नवाबगंज पहुंची तत्पश्चात गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह पछियापुर में प्रभात फेरी का समापन किया गया। इस दौरान संगत द्वारा गुरबाणी शब्द कीर्तन करके माहौल को भक्ति मय बनाया गया । वहीं बाबा दीप सिंह गतका अखाड़ा रुद्रपुर के सदस्यों द्वारा गतके के जौहर दिखाते हुए तलवारबाजी नेजा बाजी सहित अन्य हैरत अंगेज करतब दिखाए । वही संगत ने भी एक दूसरे को शुभकामनाएं प्रदान करते हुए बाबा दीप सिंह जी का जन्मदिन मनाया । मार्ग में जगह-जगह पर विभिन्न प्रकार के प्रसाद की सेवा करके संगत ने पुण्य कमाया ।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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