
बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रंगों का त्यौहार होली खुशी, उल्लास व रंगों से सराबोर करने वाला है पतझड़ के उपरान्त पेड़ों पर नयी कोपलें आने लगती है प्रकृति अपना विभिन्न प्रकार से श्रृंगार करने लगती है।जन्म उल्लास का आधार है और मृत्यु ही नये जन्म का कारण बनती है यही होली का तत्त्व दर्शन है रंग से एक दिन पहले होलिका- दहन मनाया जाता है यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है क्योंकि इसमें बुराई रूपी दुष्ट होलिका जल गई भक्ति रूपी सत्य, प्रहलाद भक्त की भगवान विष्णु ने रक्षा की। यह त्यौहार हमारी समृद्ध लोक -परम्परा व सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित करता है यह समाज के सभी वर्गों में प्रेम, एकता सौहार्द व मेलजोल बढ़ाने वाला त्यौहार है जीवन में प्रेम व मानवता होना बहुत जरूरी है इन रंगों व मानव मुल्यो के बिना जिंदगी रंगहीन है पंच तत्वों से बने मानव शरीर व प्रकृति के बीच का संबंध होली में खुलकर प्रकट होता है बसन्त ऋतु में प्रकृति रंगों की छटा बिखेरती हैं होली का रंगोत्सव जनजीवन में उतरा प्रतीत होता है बसंत का मदमस्त मौसम, सरसों का फूलना ,सुदूर फैली हरियाली मानव मन में सहज ही कामनाएं उदीप्त करने वाली होती है। उल्लास रंगो में भीगकर अंतस के कलह-कलुष स्वतःमुक्त हो जाते हैं मन-मस्तिष्क हल्का हो जाता है फाग ,होली ,धमाल, रसिया,ठुमरी, जोगीरा जैसे लोकगीत लोग-लुगाइयां गाती है जो इस त्यौहार में जीवंतता व उल्लास भरते हैं । मिष्ठान, गुजिया, पापड़,कचरी , जैसे व्यंजनों का लोग आनन्द लेकर खाते हैं बरसाने की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है सभी ब्रजमंडल के सभी भक्त गोप_गोपियां बन होली खेलते हैं अपने आराध्य राधा -कृष्ण को अपने मन में धारण कर लट्ठमार होली खेलते हैं गोपियां प्रेम से लट्ठमार करती है हुरियार ढाल से अपना बचाव करते हैं आज बरज में होली ये रसिया ,फाग खेलन बरसाने आए हैं नटवर नंद किशोर जैसे रसिया ब्रजवासी गाते हैं उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में खड़ी होली,बैठकी होली व महिलाओं की होली के आने से कई दिन पहले शुरू हो जाती है लोग रागो से सजी होली हारमोनियम व ढोलक की मधुर झंकार व थाप पर व बड़ी श्रद्धा पूर्वक इसका आयोजन कर गायन-वादन करते हैं व मिलकर खाते-पीते हैं व अपने भाव को प्रकट कर खुशी का इजहार करते है। इस त्यौहार में नशे से ,आपसी बैरभाव से व हुड़दंग से दूर रहकर प्रेम, सद्भभाव व शान्तिपूर्वक तरीके से एक दुसरे को अबीर-गुलाल रंग लगाकर व गले मिलकर मिलजुल इस त्यौहार को मनाना चाहिए। तभी इस होली पर्व को मनाने की सार्थकता है
प्रस्तुति –नरेश छाबड़ा आवास-विकास रूद्रपुर










