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देहरादून में सरेराह जिस व्यक्ति की हत्या हुई, वह कोई आम नाम नहीं था—वह वही विक्रम शर्मा था, जिस पर 50 से अधिक मुकदमे दर्ज होने की चर्चा रही, जिनमें लगभग 30 मामले हत्या से जुड़े बताए जाते हैं। विडंबना देखिए, जिस शख्स पर खून के आरोपों का साया था, उसका अंत भी गोलियों से हुआ। यह केवल एक हत्या नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें अपराध, राजनीति और प्रभाव का त्रिकोण अक्सर कानून से ऊपर दिखता है।

2007 में अपराध की दुनिया में कदम रखने वाले विक्रम शर्मा के खिलाफ जयराम सिंह की हत्या, श्रीलेदर्स के मालिक आशीष डे की हत्या, साकची के काशीडीह निवासी रवि चौरासिया पर फायरिंग, बर्मामाइंस में परमजीत सिंह के भाई सत्येंद्र सिंह के ससुराल में फायरिंग और परमजीत सिंह हत्याकांड सहित कई मामलों में पुलिस चार्जशीट दाखिल कर चुकी थी। अदालत के आदेशों के बावजूद वर्षों तक जेल न जाना, 15 अप्रैल 2017 को जेल भेजा जाना, फिर जमानत मिलना और दोबारा जेल न लौटना—ये घटनाएं न्याय-प्रक्रिया की जटिलता और कमजोरी दोनों की ओर इशारा करती हैं।

कहा गया कि राजनीतिक संरक्षण मिला, दल बदला और “दाग” धुल गए। यही वह जगह है जहां जनता “वॉशिंग मशीन” की उपमा देती है। यदि किसी व्यक्ति पर इतने गंभीर आरोप हों और वह राजनीति के सहारे सामाजिक वैधता पा ले, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। और यदि ये आरोप अतिरंजित हैं, तो फिर पारदर्शी जांच और स्पष्ट सार्वजनिक संवाद क्यों नहीं?

आज विक्रम शर्मा की हत्या के बाद एक और प्रश्न खड़ा है—क्या यह अंत न्याय है या अपराध की दुनिया का चक्र? उसके हत्यारे भी गिरफ्तार होंगे, जेल जाएंगे, जमानत पाएंगे—और कहानी फिर दोहराई जाएगी। लेकिन इस पूरे चक्र में सबसे ज्यादा भय और असुरक्षा आम नागरिक झेलता है।

देहरादून जैसे शांत माने जाने वाले शहर में जब अपराध की ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं रहती। यह कानून-व्यवस्था की प्राथमिकताओं, पुलिस सुधार, न्याय की गति और राजनीतिक नैतिकता का आईना बन जाती है। क्या हमारी व्यवस्था इतनी मजबूत है कि अपराधी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर न हो? या फिर सत्ता के समीकरण ही अंतिम सत्य हैं?

इस हत्या ने एक बात स्पष्ट कर दी—अपराध का रास्ता अंततः विनाश की ओर ही ले जाता है। लेकिन लोकतंत्र का उद्देश्य केवल अपराधी का अंत नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें अपराध पनपे ही नहीं, और पीड़ित पक्ष दर-दर की ठोकरें न खाए।

जब तक राजनीति में प्रवेश के मानदंड कठोर नहीं होंगे, न्याय त्वरित और निष्पक्ष नहीं होगा, और मीडिया निर्भीक नहीं होगा—तब तक समाज में यह प्रश्न गूंजता रहेगा: क्या इस देश में ईमानदार होना कठिन और प्रभावशाली अपराधी होना आसान है?

अब जरूरत भावनात्मक बहस की नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार की है। क्योंकि डर में जीता समाज लोकतंत्र की असली हार है।

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