
प्रयागराज।सनातन धर्म की आस्था और परंपराओं के प्रतीक शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज माघ मेला बिना संगम स्नान किए छोड़ दिया। बुधवार को काशी प्रस्थान से पहले आयोजित प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि “मन इतना व्यथित है कि पवित्र संगम का जल भी शांति नहीं दे सकता।” उनका यह निर्णय केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि सनातन प्रतीकों के कथित अपमान के विरुद्ध एक आध्यात्मिक विरोध के रूप में देखा जा रहा है।शंकराचार्य ने कहा कि प्रयागराज सदैव आस्था, शांति और धर्म का केंद्र रहा है। वे श्रद्धा और विश्वास के साथ माघ मेले में आए थे, लेकिन जिस घटना ने उन्हें व्यथित किया, उसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “जिन्होंने सनातनी प्रतीकों का अपमान किया है, उन्हें उनकी औकात दिखानी होगी।”
उन्होंने बताया कि माघ मेला प्रशासन की ओर से उन्हें पूरे सम्मान के साथ पालकी द्वारा संगम ले जाकर स्नान कराने, पुष्पवर्षा करने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि जब हृदय में दुख और क्षोभ हो, तब बाहरी सम्मान और पवित्र जल भी आत्मिक शांति नहीं दे सकते।
धार्मिक जगत में इस घटनाक्रम को गहरी चिंता के साथ देखा जा रहा है। संतों और श्रद्धालुओं का मानना है कि शंकराचार्य का यह कदम सत्ता, व्यवस्था और समाज—तीनों के लिए आत्ममंथन का विषय है। यह संदेश देता है कि धर्म केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि सम्मान और मर्यादा की अपेक्षा भी करता है।मामले ने अब कानूनी रूप भी ले लिया है। अधिवक्ता गौरव द्विवेदी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच की मांग की है। वहीं, माघ मेला 15 फरवरी तक चलेगा, जिसमें अभी माघी पूर्णिमा (1 फरवरी) और महाशिवरात्रि (15 फरवरी) के दो प्रमुख स्नान शेष हैं, लेकिन विवाद के चलते शंकराचार्य ने 18 दिन पूर्व ही मेले से विदाई ले ली।धार्मिक दृष्टि से यह घटनाक्रम एक स्पष्ट संकेत है कि जब आस्था आहत होती है, तो संत का मौन त्याग भी सबसे बड़ा प्रतिरोध बन जाता है।











