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सितारगंज राष्ट्रीय बालिका दिवस पर बेटियों को मिला प्रेरणादायक अवसर इस मौके पर कस्तूरबा गांधी स्कूल की बालिकाओं को
सितारगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर एक अनूठी और प्रेरणादायक पहल देखने को मिली। इस मौके पर स्वार्थी राणा को एक दिन के लिए डिलीवरी रूम इंचार्ज तथा दीक्षा आर्या को एक दिन के लिए सीएचसी सितारगंज की मुख्य चिकित्सा अधीक्षक बनाया गया।
कार्यक्रम के दौरान मौजूद मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. कुलदीप यादव ने बताया कि यह कदम राष्ट्रीय बालिका दिवस को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है, ताकि बेटियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल सके। उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य यह संदेश देना है कि बेटियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं और यदि उन्हें सही अवसर मिले तो वे नेतृत्व की भूमिका भी बखूबी निभा सकती हैं।
डॉ. कुलदीप यादव ने आगे कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों से बालिकाओं में आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें यह एहसास होता है कि वे भी अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सकती हैं। कार्यक्रम के दौरान स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों ने भी दोनों बालिकाओं का उत्साहवर्धन किया और उन्हें शुभकामनाएं दीं।
राष्ट्रीय बालिका दिवस पर आयोजित यह पहल न केवल प्रेरणादायक रही, बल्कि समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच को मजबूत करने का भी संदेश देती नजर आई। दोनों बालिकाओं ने बताया कि आज हमें बहुत अच्छा लग रहा है और हम अपना भविष्य उज्जवल जरूर करेंगे

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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