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तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग में ज्ञान, बुद्धि एवम् नवाचार थीम पर हुई बसंत पंचमी में रंगोली प्रतियोगिता में दक्षिता सिंह, अनुष्का मोहन और दिशिका कश्यप विजेता रहे। इसके अलावा पतंग निर्माण, वाद्य यंत्र प्रस्तुति, गायन,नृत्य सरीखी प्रस्तुतियां में भी स्टुडेंट्स ने अपनी कल्पनाशीलता और कलात्मक कौशल का अद्भुत प्रदर्शन किया। इससे पूर्व सीसीएसआईटी के सभागार में बसंत पंचमी के भव्य सांस्कृतिक उत्सव का शुभारंभ फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग के डीन प्रो. राकेश कुमार द्विवेदी, सीसीएसआईटी के विभागाध्यक्ष प्रो. शंभु भारद्वाज, एडिशनल एचओडी डॉ. रूपल गुप्ता, सीसीएसआईटी की कल्चरल कोऑर्डिनेटर सुश्री स्वाति चौहान और फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग की कल्चरल कोऑर्डिनेटर्स- डॉ. इंदु त्रिपाठी, सुश्री निकिता जैन आदि ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करके किया।

डीन प्रो. द्विवेदी ने बसंत पंचमी के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं शैक्षिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा, बसंत पंचमी ज्ञान, विद्या, सकारात्मकता और नवचेतना का प्रतीक है। यह पर्व हमें निरंतर सीखने, सृजनशील रहने और जीवन में उजास और आशा बनाए रखने की प्रेरणा देता है। प्रो. शम्भू भारद्वाज के संग-संग डॉ. रूपल गुप्ता, डॉ. रंजना शर्मा आदि ने भी विचार साझा किए। रंगोली प्रतियोगिता में आँचल, सिया और रक्षा वर्मा द्वितीय, जबकि नैन्सी चौहान, संस्कृति ठाकुर और निधि तृतीय स्थान पर रहे। कार्यक्रम में प्रो. प्रदीप कुमार, डॉ. अशोक कुमार, डॉ. प्रियांक सिंघल, डॉ. नमित गुप्ता, डॉ. नूपा राम चौहान, डॉ. पराग अग्रवाल, डॉ. शालिनी निनोरिया, डॉ. विशाल मोहन गुप्ता, डॉ. प्रीति रानी, मो. सलीम आदि मौजूद रहे। संचालन स्टुडेंट्स जिया सिंह और गौरी ने किया।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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