
काशीपुर/हल्द्वानी।
काठगोदाम, हल्द्वानी में 10/11 जनवरी 2026 की रात किसान स्वर्गीय सुखवंत सिंह द्वारा की गई आत्महत्या अब सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रही, बल्कि यह मामला उत्तराखण्ड पुलिस की कार्यप्रणाली, संवेदनहीनता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया है। किसान की मौत के बाद सामने आए आरोपों, वायरल वीडियो और ई-मेल ने पुलिस महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया, जिसके बाद पुलिस मुख्यालय को मजबूरी में विशेष जांच दल (SIT) का गठन करना पड़ा।
ई-मेल और वीडियो को पहले किया गया नजरअंदाज
सूत्रों के अनुसार, मृतक किसान ने आत्महत्या से पूर्व ई-मेल के माध्यम से अपनी पीड़ा, मानसिक उत्पीड़न और स्थानीय लोगों के साथ-साथ ऊधमसिंहनगर पुलिस के कुछ अधिकारियों व कर्मचारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। यही नहीं, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में भी किसान ने खुले तौर पर अपनी व्यथा रखी थी। इसके बावजूद शुरुआती दौर में पुलिस ने न तो गंभीरता दिखाई और न ही समय रहते प्रभावी कार्रवाई की। सवाल यह उठता है कि यदि समय पर शिकायतों को संज्ञान में लिया जाता तो क्या एक किसान की जान बचाई जा सकती थी?
जनआक्रोश और दबाव के बाद बनी SIT
मामले ने जैसे-जैसे तूल पकड़ा और जनआक्रोश बढ़ा, पुलिस मुख्यालय को बैकफुट पर आना पड़ा। पुलिस महानिरीक्षक STF नीलेश आनन्द भरणे की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय SIT का गठन किया गया, जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया है। हालांकि पुलिस निष्पक्ष जांच का दावा कर रही है, लेकिन यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि अगर सब कुछ ठीक था तो SIT की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
स्थानांतरण खुद स्वीकारोक्ति?
पुलिस ने निष्पक्षता का हवाला देते हुए इस मामले से जुड़े 03 उपनिरीक्षक, 01 सहायक उपनिरीक्षक, 01 मुख्य आरक्षी और 07 आरक्षियों समेत कुल 12 पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से गढ़वाल रेंज के चमोली और रुद्रप्रयाग जिलों में स्थानांतरित कर दिया। जानकारों का मानना है कि यह कदम पुलिस की मजबूरी और भीतरखाने की गड़बड़ी की ओर इशारा करता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई दोषियों को बचाने की कोशिश है या फिर सिर्फ जनता की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास?
पुलिस की चुप्पी बनी संदेह का कारण
किसान की मौत के बाद लंबे समय तक पुलिस की चुप्पी ने संदेह को और गहरा कर दिया। न तो तत्काल कोई स्पष्ट बयान आया और न ही आरोपों पर कोई ठोस जवाब। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि पुलिस मामले को दबाने या समय के साथ ठंडा करने की कोशिश कर रही है।
न्याय या सिर्फ औपचारिकता?
पुलिस मुख्यालय ने भले ही यह चेतावनी दी हो कि जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही या पक्षपात बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों पर कठोर कार्रवाई होगी, लेकिन जमीन पर हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। किसान के परिवार को अब भी न्याय का इंतजार है, जबकि पुलिस की साख इस पूरे प्रकरण में दांव पर लगी हुई है।
पुलिस की विश्वसनीयता पर संकट
अब यह मामला केवल एक किसान की आत्महत्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे पुलिस तंत्र की संवेदनशीलता, पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। सवाल साफ है—क्या SIT सच में दूध का दूध और पानी का पानी करेगी, या फिर यह भी जांच के नाम पर एक और फाइल बनकर रह जाएगी?
किसान सुखवंत सिंह की मौत ने व्यवस्था को आईना दिखाया है। अब देखना यह होगा कि पुलिस इस आईने में अपनी सच्चाई स्वीकार करती है या फिर इसे भी समय के साथ धुंधला कर दिया जाएगा।










