
छलिया नृत्य, लोक झांकियों और ढोल-दमाऊ की गूंज के साथ सात दिवसीय मेले का भव्य आगाज़


कृषि फार्म में दीप प्रज्वलन कर शुभारंभ, 20 वर्षों से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का जीवंत मंच बना उत्तरायणी कौतिक
खटीमा। माघ मास के पावन अवसर पर सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण होने के साथ ही उत्तराखंड की लोक आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक उत्तरायणी कौतिक खटीमा पूरे भव्यता और उल्लास के साथ प्रारंभ हो गया। सात दिनों तक चलने वाले इस सांस्कृतिक महोत्सव का शुभारंभ नगर में निकाली गई भव्य शोभायात्रा और पारंपरिक कार्यक्रमों के साथ किया गया, जिसने खटीमा को पूरी तरह उत्तरायणी रंग में रंग दिया।उत्तरायणी कौतिक के उद्घाटन अवसर पर नगर के मुख्य मार्गों से होकर विशाल सांस्कृतिक शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें उत्तरायणी कौतिक उत्थान मंच के पदाधिकारी, कलाकार, विद्यालयों के छात्र-छात्राएं एवं बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक शामिल हुए। शोभायात्रा में कुमाऊनी लोकनृत्य छलिया, पारंपरिक परिधान, ढोल-दमाऊ की थाप और विविध सांस्कृतिक झांकियों ने जनमानस को मंत्रमुग्ध कर दिया। मार्ग के दोनों ओर खड़े नागरिकों ने तालियों की गूंज के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
शोभायात्रा के पश्चात सभी प्रतिभागी आयोजन स्थल कृषि फार्म पहुंचे, जहां मुख्य पदाधिकारियों द्वारा दीप प्रज्वलन कर उत्तरायणी कौतिक का विधिवत शुभारंभ किया गया। उद्घाटन समारोह में सांस्कृतिक आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला।कुमाऊं उत्तरायणी कौतिक उत्थान मंच के अध्यक्ष ठाकुर सिंह खाती ने कहा कि यह उत्तरायणी मेला खटीमा में लगातार लगभग दो दशकों से आयोजित किया जा रहा है और आज यह आयोजन उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के संरक्षण का एक सशक्त मंच बन चुका है। उन्होंने कहा कि मेले का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की पारंपरिक लोकसंस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य, वेशभूषा और रीति-रिवाजों को समाज और विशेषकर नई पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करना है। इसके साथ ही अन्य भाषाओं, क्षेत्रों और धर्मों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से सांप्रदायिक सौहार्द और ‘अनेकता में एकता’ का संदेश देना भी इस आयोजन की महत्वपूर्ण विशेषता है।वहीं मेला प्रभारी एडवोकेट के.डी. भट्ट ने बताया कि यह उत्तरायणी कौतिक सात दिनों तक चलेगा। उन्होंने कहा कि माघ माह में सूर्य का उत्तरायण होना धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उत्तरायणी पर्व के साथ जुड़ा यह कौतिक हमारी लोकपरंपराओं, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि मेले के माध्यम से उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है।उत्तरायणी कौतिक के दौरान प्रतिदिन कुमाऊनी लोकनृत्य, लोकगीत, पारंपरिक व आधुनिक सांस्कृतिक कार्यक्रम, विद्यालयों के बच्चों की प्रस्तुतियां, अन्य राज्यों एवं भाषाओं की सांस्कृतिक झलकियां प्रस्तुत की जाएंगी। यह मेला न केवल सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बनेगा, बल्कि सामाजिक समरसता और लोकसंस्कृति के संरक्षण की दिशा में भी एक मजबूत संदेश देगा।नगरवासियों में उत्तरायणी कौतिक को लेकर विशेष उत्साह देखा जा रहा है। पारंपरिक उल्लास, लोकधुनों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच यह आयोजन खटीमा को एक बार फिर उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में स्थापित करता प्रतीत हो रहा है।











