भारतीय संस्कृति में प्रभु राम की बहुत महत्ता है जब भी संसार कभी आदर्श पुत्र का उदाहरण प्रस्तुत होता है तो प्रभु श्री राम का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है भारतीय-जनमानस में प्रभु राम रच-बस गये है जब किसी को कोई दुःख या पीड़ा होती है तो वह कहता है हाय राम, या किसी को कोई अचम्भा होता है तो वह कहता है हे राम, या जब कोई कोई किसी को मिलता है तो परस्पर एक दुसरे को राम-राम कहकर अभिवादन करते हैं किसी बालक के जन्म लेने पर पहला अक्षर उसके श्रवण- अंग में पहला अक्षर राम -राम का उच्चारण कर उसके जीवन यात्रा मे सुख-समृद्धि की कामना की जाती है,कि जीवन भर रह प्रभु नाम से जुड़ा रहे व जीवनपर्यंत ईश्वर स्मृति बनी रहे। प्रभु राम के आदर्श गुणों को व पवित्र नाम को अपने जीवन में समाहित कर सके।किसी के पार्थिव- शरीर की अंत्येष्ठि पर राम -नाम सत्य है कहा जाता है पार्थिव देह के पीछे चलने वाले इसी लिए कहते हैं कि इस नश्वर संसार को छोड़कर जाने वाले की आत्मा की शान्ति की कामना की जाती है और संसार की असारता का भान कराया जाता है कि संसार के लिए कितना भी झूठ, फरेब व त्याग व कठिन परिश्रम कर लिया जाये अंत में जीवन का यथार्थ यही है सब कुछ त्याग कर खाली हाथ प्रभु तक पहुंचना व उनका सामना कर गुजरें मानव जीवन का मुल्यांकन करना ही है जीवन के हर सुख-दु़़ख व हर मोड़ पर राम को हम उन्हें अपने साथ खड़ा पाते हैं प्रभु श्रीराम के आदर्शो को ग्रहण करने के लिए प्राचीन काल से ही राम चरित्र मानस की कथाओं का वाचन और श्री रामलीलाओं का मंचन किया जाता है कि जिससे लोग व नयी पीढ़ी के बच्चे प्रभु राम के आदर्शो व उनकी जीवन कथाओं लीलाओ के माध्यम से अपने जीवन में उतार सके।प्रभु राम का जीवन कितने कष्टों से भरा होने पर भी वह जीवन में हार न मानते हुए परस्पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता हैं संग्रह से त्याग अधिक महत्वपूर्ण होता है यह महामंत्र लोगों को दिया।माता सीता का पंचवटी में लक्ष्मण -रेखा की लीला यह सीख प्रदान करती है कि हर स्त्री व पुरुष के जीवन में एक मर्यादा की लक्ष्मण -रेखा है जो उसे बिना सोचे विचारे पार करेगा पार करेगा वह आने वाली परेशानियो व दुःखो से फिर नहीं बच सकता। रामायण का एक -एक पात्र हमें प्रेमा-भक्ति,त्याग व अपनी निष्ठा, कर्त्तव्य-पालन की न कुछ सीख अवश्य देता है जो प्रभु का प्रेम व समीपता पाने के लिए आवश्यक है प्रभु श्री राम जी के जीवन से सीख लेकर व उनके बताए आदर्शों को आत्मसात कर अपने मानव जीवन को सार्थक व सफल बना सकते हैं
नरेश छाबड़ा
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