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पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। नगर निकाय चुनाव-2024 को लेकर प्रथम मतदान कार्मिकों का प्रेक्षागृह पौड़ी में प्रशिक्षण संपन्न हुआ। प्रशिक्षण में 278 मतदान अधिकारियों द्वारा प्रतिभाग किया गया। इस दौरान उन्हें निकाय चुनाव को लेकर संपूर्ण जानकारी दी गई। गुरूवार को आयोजित प्रशिक्षण में मुख्य विकास अधिकारी गिरीश गुणवंत ने सभी मतदान कर्मिकों को निर्देश देते हुए कहा कि चुनाव में मतदान प्रक्रिया को अत्यंत गंभीरता से लें। उन्होंने सभी कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे मतपेटियों को खोलने और बंद करने की प्रक्रिया प्रशिक्षण बेहतर तरीके से लें। जिससे मतदान दिवस पर किसी भी दिक्कतों का समाना न करना पड़े। उन्होंने कहा कि चुनाव को सफल बनाने के लिए सभी मतदान कर्मचारियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सभी कार्मिकों को अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए पूरी निष्ठा और लगन से कार्य करने को कहा। कहा कि चुनाव के दौरान किसी भी प्रकार की शिथिलता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रभारी चुनाव अधिकारी दीपक रावत ने सभी प्रथम मतदान कार्मिकों को उनके दायित्वों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने मतदान प्रक्रिया के दौरान अमिट स्याही का निशान लगाना,टेंडर वोट व चेलेंजर वोटो की पहचान करना,किसी व्यक्ति के नाबालिग होने की शिकायत पर उसे किस तरह से घोषणा पत्र भरवाए,मतदान स्थल के चारों ओर आदर्श आचार संहिता का अनुपालन,मतपेटियों को किस प्रकार से खोलें व मतदान पूर्ण होने के बाद उसे कैसे सील बंद करें सहित अन्य के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी दी। प्रशिक्षण में जिला शिक्षाधिकारी माध्यमिक रणजीत सिंह नेगी,सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी पंच स्थानीय अतुल भट्ट व प्रथम मतदान कार्मिक उपस्थित थे।

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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहासलाल बिहारी लालसदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई । वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है । प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है ।इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास ।

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